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#खोल
5 poems
3 - उड़ान
Renuka Chugh Middha · 1 min read · 311 reads
और हर बार थोड़ा और कस के कहीं खुल ना जाए फिर दोबारा।
Abstract
रात
Palak Inde · 1 min read · 417 reads
मैं टूटती थी हज़ारों टुकड़ों में हर रात, हर सुबह खुद को वापिस समेटती थी!
Tragedy
गुज़रे लम्हों के दोबारा पन्ने खोल रही हूँ मैं
Sonroopa Vishal · 1 min read · 13K reads
गुज़रे लम्हों के दोबारा पन्ने खोल रही हूँ मैं
Others
मैं नादान
Mehwish Naushin · 1 min read · 300 reads
बस पर खोल के उड़ जाना चाहती ये आसमान देखना है और सितारे छूने हैं
Inspirational
वोट
Vijay Kumar उपनाम "साखी" · 1 min read · 181 reads
वोट की तू ताकत समझ, इसे न जान व्यर्थ बोल है
Others