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#चाक
13 poems
कोटि-कोटि वर्षों से यूँ ही
अच्युतं केशवं · 1 min read · 233 reads
कोटि-कोटि वर्षों से यूँ ही कुम्भकार का चाक घूमता।
Drama
मिट्टी का दीया
नूपुर Noopur शांडिल्य Shandilya · 1 min read · 221 reads
अंधकार को भेद कर उजाले से लौ लगाता है
Abstract
समय पर घोंसले में लौटना ज़रूरी
Rashmi Prabha · 1 min read · 264 reads
चाक पर चढ़ने के लिए खुद को कुम्हार के हवाले करना होता है
Inspirational
मज़ाक नहीं लिख रही हूँ
Asha Pandey 'Taslim' · 1 min read · 6.9K reads
आज लफ़्ज़ों को गढ़ रही हूँ मैं उन आँखों को खोलकर जिस पर काली पट्टी बंधी हैं तुम भी सच्चाई से रु-ब -रु हो जाना
Others
कुम्हार की माटी
Lamhe zindagi ke by Pooja bharadawaj · 1 min read · 563 reads
इतराती हूं मैं तेरे,चाके पर घूम घूम कर जब देता तू मुझको आकार नया !
Abstract
चाँद तू पाक है
Vijay Kumar उपनाम "साखी" · 1 min read · 150 reads
चाँद तू बड़ा पाक है आँखों का तू चाक है
Inspirational
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