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#दुख
404 poems
अस्पताल
Mukesh Nirula · 1 min read · 6.8K reads
बीमारों की भीड़ में, हैं अपने कुछ लोग रोज़ दवाई खा रहे, दुख को रहें हैं भोग चारों और हैं सुन रहे, लोगों के दुख की बात काटे से न कट रही, लम्बी है जो दुख की रात घर का बिस्तर है सूना और, वहाँ भी है तन्हाई यह इन को क्या हो गया, क्यों दुख की घड़ी है आई हम भगवन से कह रहे, सब जल्दी अच्छे हो जाऐं ख़ुशी-ख़ुशी ही यह सारे, अपने-अपने घर जाऐं
Others
ज़िन्दगी के सिलबट्टे
Sandeep Singhatwadia · 1 min read · 582 reads
जिंदगी के सिलबट्टे में ये सुख दुख के दाने हैं।
Drama
बँटी हुई सी
Swaraangi Sane · 1 min read · 119 reads
उसके अंतस में ऐसी कई चीज़ें हैं जो पर्वत हो गई हैं।
Drama
पत्नी पीड़ा
Archna Goyal · 1 min read · 355 reads
मिलजुल कर काम करेंगे हम तुम एक तुम एक मैं मिल दो हो जाएगे
Abstract
एक बुजुर्ग की व्यथा
Aakash Shah · 1 min read · 636 reads
आज एक बुजुर्ग के पास जाकर बैठा, थोड़ी देर बाद हाल-चाल पूछ बैठा। आँखों में आँसू भरकर वो
Tragedy
मैं स्वार्थी हूँ
Shashi Rawat · 2 min read · 551 reads
मायके का दुलारा हूँ तो ससुराल का पिल्लर भी तुम्हारा साथ निभाते-निभाते
Abstract
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