बंद दरवाजों को खोल
पहनाई गयी सांकलों को तोड़
चल पड़े है कदम
अनजान सफर पर
न साथी है, न मंज़िल की खबर
जाने क्या ढूंढ रही है नज़र
किस ओर बढ़ चले है कदम
मुझ को है ना कोई खबर
मगर चल पड़े है तो चलते रहेंगें,
खुशी का एक नया ख़्वाब बुनते रहेंगें
ये रास्ता कहीं तो जाएगा
नई मंज़िल से मिलवाएगा
तब ये सफर अनजान नहीं रह जाएगा..
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