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Poem · Abstract

अंतर्द्वंद

by GOPAL RAM DANSENA ✓ · 6 Mar 2022

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मानवता रो रही, दुबक कर लहूलुहान। यहीं रहा तो जग हो कर रहेगा विरान।

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अंतर्द्वंद · StoryMirror