by Nandini Upadhyay ✓ · 12 Jul 2019
न कोई रोक टोक, न ही किसी का सुनना, अपनी ही धुन में चलना, नये ख्वाब बुनना। यह हिमाकत मेह की बूंदों में ही होती है, बेबस नारी ऐसा बिल्कुल नही कर पाती ।
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