by डॉ. वीरेन्द्र प्रताप सिंह 'भ्रमर' ✓ · 15 Jul 2019
रख अल्हड़ता इठलाती है। प्रासादों में हँसी कदाचित् ऐसी हमको दिख पाती है।। नयनों के सँग अधर हँसें जब, 'भ्रमर'झलकता है अपनापन।
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