
विकास के मानकों को तय करने वालों ने जिन आधारों को चुना है... क्या वे सही अर्थो में विकास को समझ रहे होते हैं... चकाचौंध से परे, मुखौटें के पीछे की सच्चाई-सुंदरता की परिभाषा हो सकती है क्या? छोटे शहर की कहानी कहती यह कविता ऐसे ही तमाम प्रश्न बुनती चली जायगी, डुंगरपुर के चित्र को आपके मानस में उतारने के प्रयास के साथ विकास के मानको को भी पुन: सोचने को उद्देलित करेगी।
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