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Poem · Drama

दुख ही दुख

by नवल पाल प्रभाकर दिनकर ✓ · 19 Aug 2018

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और कुछ देने को आतुर हो अपने अन्दर भरे पड़े अथाह गहन धन कोष से शंख सिपियां बिखेर जाती हैं।

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दुख ही दुख · StoryMirror