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by Praveen Golaहाँ , मेरे साथ कोई चलता है
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मैं रोज गिरती हूँ ,

कोई मुझे रोज पकड़ता है ,

हाँ , मेरे साथ कोई चलता है।


मैने महसूस किया ,

उसके अस्तित्व को ,

जब धरातल पर मेरा संतुलन बिगड़ता है ,

तब वही मेरा हाथ पकड़ता है |


मैं थके तन से कदम बढ़ाती हूँ ,

और मन में उदासी को घेरे जाती हूँ ,

पर अचानक से जोश अंदर उमड़ता है ,

वो मेरे साथ ही कदम जो भरता है |


मैं फिर व्यस्त हो जाती हूँ ,

अपनी ही धुन में गुनगुनाती हूँ ,

वो हौले से मेरी भूख को उजागर करता है ,

हाँ , वो मुझमे नई ऊर्जा प्रदान करता है।


मैं उसका शुक्रिया अदा करती हूँ ,

उसे पाने के लिए थोड़ा मचलती हूँ ,

वो अदृश्य बन मेरे अंदर ही कहीं उतरता है ,

मेरे लबों से तब एक ही नाम निकलता है |


मैं रोज़ माँगती हूँ ,

कोई मुझे रोज़ देता है ,

हाँ , मेरे साथ कोई चलता है ||


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