जब ख़ुदा का मुझे आसरा मिल गया
लोग कहने लगे जाने क्या मिल गया
बात दिल में छुपी भी समझ जाए जो
मीत ऐसा जहां से जुदा मिल गया
जिस डगर हम चले थे समर्पण लिए
बस वहीं पे वफ़ा का सिला मिल गया
जान लो फ़िर कभी वो उठा ही नहीं
गर समय से बशर को दगा मिल गया
सोचता था जिसे यह मुसाफ़िर कठिन
उस ग़ज़ल का हमें क़ाफ़िया मिल गया।
Loading comments…