
हर दिन हमारी आँखों के सामने, हमारे आसपास इंसानियत का कत्ल होता है और हम कुछ करना तो दूर कुछ कहते भी नहीं हैं। सिर्फ़ चुप चाप देखते रहते हैं। समाज में इंसानों की सोच और सिद्धांतों के स्तर में लगातार आती गिरावट और इसके बारे में कुछ ना कर पाने की वजह से मैं खुद अपने आपसे ख़फ़ा हूँ और ये कविता किसी और से ज़्यादा खुद मुझपर कटाक्ष है।
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