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Poem · Others

रौशनदान

by Rishabh Goel ✓ · 29 Aug 2017

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  सोचता हूँ मैं तुम्हारा रौशनदान बन जाऊँ, दिन भर ऊपर बैठा टकटकी लगा कर तुम्हे देखता रहूँ, रात होते ही अँधेरे में कहीं ग़ुम हो जाऊं। तुम्हें दिन भर का उजाला दूँ,और सारी सर्द हवाओं को रोक लूँ, धूप खिलते ही तुम्हें पहली किरण दूँ, मिट्टी के कणो से तुम्हेँ छू लूँ।

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रौशनदान · StoryMirror