अपनी वीणा के तारों पर
फिर सप्त स्वरों को छेड़ दो
जीवन की विस्मृत पगडंडी को
आज नया एक मोड़ दो।
मानस के कुंठित कंठों को
सुमधुर, सरस-से गान दो
प्रलय गमन करती आशा को
पुनः वही उत्थान दो।
विकृतियों के बढ़ते तन को
बार-बार संहार दो
विकल हुई मन की गरिमा को
सुंदर साज, शृंगार दो।
अधम, अमानुष, अत्याचारी
अकृत्यों को ह्रास दो
प्राणों को मुक्त-अमुक्त छंदों के
रचते, बसते-से रास दो।
नष्ट करो गहराते तम को
कलुष वृतियों को नाश दो
नृत्य करें सुंदरता दिक्-दिक्
माँ!!आज हृदय को आस दो।
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