
वृद्ध लाठी टेककर खड़े दरवाजे से भीतर कमरे में झाँक रहे थे. शायद पूरी अलर्ट बरतते हुए. शायद बहू के देख लेने और उसके बाद गरियाने, धकियाने, खींचने के उपद्रव से बचने के लिये, बिना कुछ आवाज़ किए पता नहीं कब से अधखुले दरवाज़े पर खड़े थे... “दादू !” मैं उन्हें देखकर उठा था और वे मुझे अपनी जानी-पहचानी अपरिचित नज़रों से ताक रहे थे... भीतर वाले कमरे से अचानक श्रीमती कनक मेरे लिये चाय की ट्रे लेकर आती हुईं बोलीं, “देवेश, वह पैरासाईट आदमी आ जाएगा तो चिल्लाएगा. आप दरवाज़ा अंदर से लगा के रखिये...” मैंने आवाज़ की तरफ देखकर फिर दरवाज़े की ओर देखा तो, वे बिना आवाज़ किए जा चुके थे. यकीनन अपने उस बाहर वाले कमरे की ओर जा रहे होंगे, आहिस्ता-आहिस्ता...
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