
चिरपरिचित बुढ़ा बरगद आज भी वैसा ही खड़ा है जैसा हमारे छुटपन में खड़ा था. पूंछने पर दादा-बाबा भी कहते थे-‘जब से देख रहे हैं यह ऐसे ही खड़ा है.’ उनके साथ और हमारे साथ भी यह बढ़ता रहा और गर्मी-जाड़ा-बरसात सभी मौसम सहता अपनी भुजाएं फ़ैलाता, जड़ों को मिट्टी में फैलाता और जकड़ता, शाखाओं को बरोह-स्तंभों के सहारे टिकाता इतना विशालकाय हो गया है की पूरा गाँव उसकी छाँव में आ जाय...
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