
ख़त आज फिर मुझे एक पुरान दोस्त याद आया है,लिफाफे में ख़त की जगह गुलाब आया है| पता है उस ख़त में गुलाब से ज्यादा लिखा है,जाने कब से उसे अपने सिरहाने रखा है|उसके हर एक शब्द अब भी वैसे क वैसे ही है,पंखुरियाँ सुख गई है पर शब्द अभी बोलते है|उसने हर शब्द को इतनी खूबसूरती से सजाया है,लिफाफे में.................................................|मैंने पहली बार इसे उसके बागीचे में देखा था,तितलियों से अठखेलियां करते हुए|अोश की बूंदों से नहाये हुए ,यौवन की आहट से थोड़ा शरमाये हुए |उस दिन से अब तक की हर बात पिरो कर लाया है,लिफाफे ......................................................|उसने भी इसे तोडकार कई दिनों तक अपने पास रखा होगा,और एक-एक बात गौर से समझाई होगी|तभी तो यह इतना समझदार हो गया है,और बगैर खुश्बू के भी असरदार हो गया है|तब जो चूड़ियाँ दी थी मैंने उसे ,ये उसका जबाब आया है'लिफाफे में................ .......................................|आज सुबह से मैं कैलेंडर में घूम रहा था,घर जाने क लिए एक तारीख ढूंढ़ रहा था|सपनो का जहाँ है ये मैं भी सपना सजा रहा था,खुद ही खुद केलिए सहनाई बजा रहा था |तभी दरवाजे पर डाकिया आया ,आवाज देकर मुझे बुलाया|मुझे देखकर बोला पिछली बार पता खो गया था,और गलती से ये ख़त आपका हो गया था |मैंने अनचाहे मन से वो ख़त उसे वापस दिया ,ओए जाते- जाते गुलाब को अलविदा किया|अनुराग
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