
मेरे हाथ से चींटियाँ धीरे धीरे परी के हाथ पर चढ़ने लगी थीं… मैं एक एक करके चींटियों को उसके हाथ से निकाल रही हूँ लेकिन वो उसकी त्वचा को कुतर कर उसके हाथ में छेद कर उसमें घुसने लगती है…… परी के हाथों से खून निकल रहा है… लेकिन वो चीख नहीं पा रही है….. अचानक चींटियाँ छोटे छोटे हाथों में बदल जाती है फिर हाथ धीरे धीरे बड़े होने लगते हैं… ……. मेरे सपने मुझे जीने नहीं दे रहे थे और मैं अपने इस विश्वास को मरने नहीं दे रही थी कि परी को कुछ नहीं हुआ है वो जहां भी है सही सलामत है….
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