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by Amita Kuchyaमम्मी आखिर कब तक सहन करोगी??
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शिवानी सुबह से ही घर के काम कर रही थी। वह धीरज को टिफिन पैक करके दे चुकी थी।और धीरज भी टिफिन लेकर बाहर निकल चुके थे। लेकिन जैसे ही वह अंदर आई, तब ही दरवाजे से लगातार बैल बजने की आवाज आने लगी।तो वह समझ गई कि पक्का ही धीरज ही होंगे।जिनमें धीरज नाम का गुण ही नहीं है। नाम से विपरीत है धीरज...

वह जल्दी से हाथ धुलकर दरवाजे खोलने आई,तब धीरज तमतमाते हुए कहने लगा -" अरे शिवानी ये क्या , दरवाजे खोलने में इतनी देर लगती है ?क्या कर रही थी ,जो दरवाजा जल्दी से खोल‌ न सकी।तब वह बोली-" मेरे साबुन वाले हाथ थे, कपड़े धुल रही थी। इसीलिए देर लग गई।"

अच्छा- अच्छा ठीक है, मेरा मोबाइल कहां ‌है....

मैं भूल गया तो दे न‌ सकी तुम ....

उसके बाद वह बोली -इतने सालों से हाथ में ही सामान देती आ रही हूं। "आप भी तो याद रखा करो...

तो क्या इतना भी न करोगी तुम ....

इतना कहकर वह कार स्टार्ट करके चला गया। और आफिस पहुंच गया। और यहां मन में शिवानी को लग रहा था कि मैं क्या इनकी बात सुनने के लिए ही हूं,जो ये सुनाकर चले गए, यही सब सोच रही थी ,तभी बेटा मोहित आया। और बोला -"मम्मी कहां खोई हो, पापा आए थे, फिर जली कटी सुना गये क्या?आप कुछ बोलती क्यों नहीं ?मम्मी मैं बचपन से देख रहा हूं आपको ,पापा से मिला ही क्या....

पहले भी आपने पापा के ताने और मार सहन की, अब और नहीं मम्मी ...

अब मैं बड़ा हो गया हूं ,मुझमें भी समझ आ गई है। और मैं कमाने लगा हूं। मैं छोटा था, तो कमजोर था।हां बेटा सब समझती हूं। मुझे भी पता है, मैं तुम बच्चों के कारण सब सहन कर गयी।

फिर बेटा मोहित बोला -"अब पापा को आप भी बोल दो,अब और नहीं, बहुत हो गया।

मोहित ने पापा को बचपन से मम्मी को चिल्लाते ही सुना है।वह सोचता था,कि मम्मी भी पलटकर पापा को जवाब दे सकती थी।पर वो क्यों नहीं देती थी।अब मोहित को समझ आने लगा था कि मम्मी मेरा चेहरा देखकर कुछ नहीं बोलती थी। ताकि वो मुझे काबिल और पढ़ा लिखा साहब बना सकें।इसीलिए बेकार में बहसबाजी नहीं करना चाहती थी।

फिर शाम हुई, तब धीरज अपना पैर पटकते हुए अंदर आया। उसने मुंह से कुछ नहीं बोला।आज शिवानी के अंदर भी आत्मविश्वास आ चुका था। उसे चाय पानी लाने में देर हो गई। फिर जैसे तूफ़ान तो आना ही था।ये क्या शिवानी! चाय पानी लाने में इतनी देर लगती है ?

तो वह बोली -देखो तुम मुझे बिना बात पर मत चिल्लाया करो।अब मैं तुम पर निर्भर नहीं हूं।वो मैं बच्चों के कारण उनका भविष्य देखकर चुप रहती थी।अब और नहीं सुनूंगी।तो धीरज अंदर‌ से तिलमिला गया।वो कहने लगा ज्यादा पर निकल आए है,जो इस तरह बोलने की हिम्मत कर रही हो, जैसे ही वह हाथ उठाने को करता है तभी मोहित आता है ,पापा ....

और हाथ पकड़ लेता है, बस करो पापा, आखिर कब तक ये सब करोगे? मम्मी कोई गुलाम या कठपुतली नहीं, जो चाबी भरो अपने हिसाब से चलाते रहो।आप सोचों कि हमेशा आपकी मनमानी चलेगी तो ऐसा नहीं होगा।अब मैं घर को और मम्मी को संभाल सकता हूं।

देखता हूं ,क्या कर सकते हो तुम लोग ?धीरज बोले जा रहा था।

पापा बहुत हुई आपकी मनमानी, अब ऐसा नहीं चलेगा।आप बिना बात पर चिल्लाते रहे और मम्मी सुनती रहे।

क्या कहा तुमने !तुम बहुत बोलने लगे हो। फिर क्या था, बेटे का साथ पाकर शिवानी भी बोली मुझे आपकी नहीं है जरुरत ,आप को जहां जाना है, चले जाएं। आपके बिना भी रह सकती हूं।बेटा काबिल है,अब मैंने बहुत सहन कर लिया।अब और नहीं चलेगा।इतना सुनते ही जैसे धीरज अंदर‌ तक हिल गया ,उसे घर में अपना वजूद खत्म होते हुए नजर आने लगा।आज उसे एहसास हुआ कि मैंने शिवानी पर बहुत ज्यादतियां की है।जो न केवल शिवानी ने सहन किया बल्कि बेटे ने भी महसूस किया है।इसी कारण आज मोहित इतना बोल पाया।पर आज शिवानी को अंदर से खुशी हुई वह धीरज के सामने खुलकर बोल पाई।

इस तरह धीरज‌‌ को समझ आया कि बिना बात पर चिलाने और रौब दिखाने से कुछ हासिल नहीं होता बल्कि ऐसे में घर में सम्मान भी खत्म हो जाता है।आज जो उसने अपनी बीबी और बेटे में देखा।फिर उसने शांत मन से अपने किए पर शिवानी और मोहित से गलती के लिए माफी मांगी। और कहने लगा-" मैने जो तुम्हारे साथ ऐसा व्यवहार किया ,उसके लिए मुझे माफ़ कर दो,इतने समय तुम स्वयं अपने लिए क्यों नहीं बोली।तुम सहती गई ,और मैं तुम पर हावी होता रहा।अब ऐसा बिल्कुल नहीं होगा। मुझे अपने किए पर पछतावा है, मुझे तुम दोनों माफ़ कर दो।इस तरह शिवानी खुशी- खुशी रहने लगी।

दोस्तों- स्वयं के लिए न बोलना कोई समस्या का समाधान नहीं होता।हम सामने वाले को अपने ऊपर हावी होते देना भी एक अन्याय सहन करने‌ जैसा है। इसलिए अपने आत्मसम्मान और स्वाभिमान की रक्षा करने के लिए खुलकर बोलना चाहिए ताकि आपके बहुमूल्य समय जो दुख भरा बीत रहा है , वह न बीते और जिसमें केवल हताशा और दुख के पन्ने है ,उसे जब खोले केवल दुखदाई यादें ही न सिमटे। इसलिए स्वयं भी अपने आप में खुश होकर जीने का जज्बा रखें।

दोस्तों- ये रचना कैसी लगी कृपया अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करें और ये रचना अच्छी लगें तो लाइक शेयर और कमेंट भी करें।

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