by Nehha Surana Bhandari ✓ · 18 Dec 2019
आँखें मूँद कर वो साइकल की घंटियाँ, बुजुर्गों के ठहाके, अख़बार की आवाज़ और चाय की ख़ुश्बू महसूस करने लगी... आँख खोली तो सिर्फ़ मैं थी, सामने देखा तो ज़िंदगी शुरू हो गयी थी... या शायद खो गयी थी!!
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