
सुबह भी मामू ने आमलेट बनाया चाय बनाई। वो रात दो बजे आमलेट और चाय के पैसे उधार कर कमरे में वापस चला गया। मामू बताता है कि सुबह उसके कमरे के बाहर मजमा लगा था। हालांकि एक गलियारा ही था। जहां लोग ठूंसे हुए थे। किसी को भी भनक नहीं लगी कि उनके बगल के कमरे में आधी रात में कैसे आवाज आई। तकरीबन नौ दस का समय रहा होगा। कमरे का दरवाजा सटा था। कई आवाज देने के बाद भी जब कोई जवाब नहीं आया तब रूम नंबर 11 वाले ने अंदर जाने की हिम्मत की। आंखें बंद। घड़ी बस चल रही थी। नब्ज का पता नहीं चल पाया।
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