
"तेरा नां की ऐ" कुछ संयत होकर कुलतार ने पूछा। अनियंत्रित उखड़ी साँस में पुन्या सब सुना गई। उसके जीवन का हर कड़वा अनुभव। कुलतार चुप सुनता रहा, बिना उससे नज़र मिलाये, वह पुन्या की आँखों में आत्मग्लानि नहीं देखना चाहता था। और यह भी चाहता था कि वो सब कहकर बोझमुक्त भी हो जाये। छोटे बच्चे की तरह वह उसकी पीठ सहलाकर साथ होना आश्वासित करता रहा। बात खत्म कर पुन्या हिचकियों में डूब गई।
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