by Ranchiwala Rakesh ✓ · 20 Aug 2018
बस में बैठी श्रद्धा किसी परिदें की तरह सहमी और निराश थी- जिसको उड़ान भरते हुए बीच में ही बहेलिये ने झपट लिया था। नियति का...
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