by Diwakar Pokhriyal ✓ · 22 Jul 2017
समाज की बलि अनेक ज़िंदगियाँ चढ़ती रहती है| परिवार अपने अंदर का समन्वय छोड़कर बाहरी दुनिया के अधीन हो जाते है| अपनो को समझने की जगह हम समाज़ के मापदंड से ज़िंदगियाँ मापते है| जितनी कलह और मौतें समाज़ के नाम पर होती है उसकी कोई गिनती नही है|
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