
धूप के टुकड़े लगातार अपनी जगह बदलते रहते। कभी रोटी की तरह थाली में नजर आते लेकिन थोड़ी ही देर में थाली से छिटक जाते। भूख बाकी रह जाती पर धूप के टुकड़े थाली से बाहर हो चुके होते। माँ के साथ अक्सर ही ऐसा होता। सबको खिलाने के बाद जब वह अपनी थाली परोसती तो जल्दी ही धूप का टुकड़ा थाली से छिटककर खाली परात में दौड़ने लगता जहाँ अब रोटियां नहीं, पपड़ाये हुए आटे की परत चिपकी रहती।
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