
आख़िर धर्म से तो उनकी विवाहिता हूँ। वे धर्म नहीं निभा पाये यह बात दीगर है। कुमार साहब अब भी मेरे लिये बेचैन रहते हैं। मैं उन्हें दोष नहीं देती, उनके पास सपने थे। रोहित ने उन सपनों को ख़रीद लिया। बुलाते हैं अक़्सर। जाती हूँ मैं। अरे, हम तो वो नालियाँ हैं मिथिलेशजी जो पुरुषों के मन के, दिमाग के, वासना के तमाम कचरे को बहा ले जाती हैं ताकि आप जैसी सुहागिनों का घर न उजड़े।"
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