आशीष त्रिपाठी
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वह धार दो करतार हे! कि प्रेम जिसमे द्रश्य हो । बह जाए सारी मलिनता बस शुद्धता ही शेष हो ।।
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वह धार दो करतार हे! कि प्रेम जिसमे द्रश्य हो । बह जाए सारी मलिनता बस शुद्धता ही शेष हो ।।
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