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#खाल
5 poems
मैं नदी मुखातिब हूँ
Rabindra Mishra · 1 min read · 185 reads
कोई नहीं है अपनी, अपनों की हाय में लूट गयी हूँ।
Drama
शह मात
Bhavna Thaker · 1 min read · 324 reads
रिश्तों का नहीं मान यहाँ इंसान ही इंसान का दुश्मन जहाँ।
Drama
जंगल का राजा
Monika Sharma "mann" · 1 min read · 197 reads
नोच नोच कर खा गए मुझको कहने को मैं जंगल का राजा था।
Tragedy
ख्याल
Goyal Ji · 1 min read · 461 reads
निचोड़ा कहीं का न छोड़ा मुझे उधेड़ोगे अब क्या मेरी खाल तुम।
Abstract
अनदेखी
Vrajlal Sapovadia · 1 min read · 252 reads
जीना नहीं किसीको हज़ारो साल फिर इकट्ठा करते क्यों इतना माल? खानदानी मची रहती बीच गोलमाल शंका के दायरे में रहती उसकी चाल पानखरके पत्तेकी तरह खरते बाल बन जाती बचपन मे शिर पे टाल
Inspirational