
भारत, भारतीय और भारतीयता उन शब्दों में से एक हैं जिन्हें सुनते ही हर व्यक्ति के अंदर देश के प्रति कुछ करने और उससे जुड़ाव रखने की भावना का वेग अचानक ही बढ़ जाता है । किन्तु आज के समय में हम अपनी ही माँ का सीना छलनी करने और उसे खोखला बनाने में कोई कसार बाकी नहीं रख रहे । मातृभूमि के ऋण से उऋण होना तोह दूर, हम उसी का सौदा करने के विचारों को समाज में पनपने का अवसर दे रहे हैं और आज स्थिति यह है की माँ के रुदन की चीत्कार हमारे कानों तक पहुँचनी बंद हो गयी है !
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