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#anandprakashjain
6 poems
एक वहशी की सज़ा मुकम्मल
Anand Prakash Jain · 1 min read · 453 reads
कोई मनचला महबूब उसे मंडप से ही उड़ा ले जाता है।
Abstract
उमड़ता पितृत्व (पिता)
Anand Prakash Jain · 1 min read · 12K reads
मेरे पास घरौंदा है बांहों का तू कसमसाहट तो पास कर आने की,
Others
अंतकाल
Anand Prakash Jain · 1 min read · 334 reads
ना ठोह कुछ ख़ुद कि ख़बर नहीं कब आयेगा अंतकाल !
Tragedy
कुदरत का इंतकाम
Anand Prakash Jain · 1 min read · 285 reads
ख़ूब घात किए है इस धरती पर तूने अब इसे भुगत ये उऋण होने की क्रिया है।
Tragedy
suicide
आ नं द · 1 min read · 126 reads
बहुत ही चोट वो खाई होगी।
Abstract
विजयरथ
Nikhil Sharma · 1 min read · 7K reads
विजयतिलक उसी का है, जो बढे स्वार्थ त्याग कर ||अंतर्मन में जो तू ज्ञानदीप जगा सके |प्रकाश मन में वो करे, जो मन तमस हटा सके ||वो महानता किस काम की, जो पौरुष न दिखा सके |वो शक्ति भी व्यर्थ है, सहस जो न जुटा सके ||
Others