by Nikhil Sharma ✓ · 19 Aug 2017
विजयतिलक उसी का है, जो बढे स्वार्थ त्याग कर ||अंतर्मन में जो तू ज्ञानदीप जगा सके |प्रकाश मन में वो करे, जो मन तमस हटा सके ||वो महानता किस काम की, जो पौरुष न दिखा सके |वो शक्ति भी व्यर्थ है, सहस जो न जुटा सके ||
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