by David Singh ✓ · 21 Aug 2017
मेरे मयकश अज़ीज़ दोस्तों के नाम एक मज्ज़हिया नज़्म पेश-ए-नज़र है. ग़लतियों को नज़रंदाज़ कीजिये, लुत्फ़ उठाइये और दाद देना ना भूलिए. कौन सा शेर सबसे अज़ीज़ था यह ज़रूर बताइयेगा.
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