by Jay Bhatt ✓ · 18 Dec 2019
अर्थहीन जीवन को, लेके चला था अर्थ ढूंढने, विरह की तड़पन से, बचा के चला खुद को, असली मर्म ज़िन्दगी का तब मालूम पड़ा, जब निकला मैं खुद के वजूद को ढूंढ़ने।
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