
मैं अपना देखूँ, कि तुम्हारा प्रस्तावना : देखा है किसी और देश में धन की पूजा होते ,भारत में होती है । जब धन वन्दनीय है , तो धनी निन्दनीय क्यों । अगर यहाँ सब ग़रीब ही रहें तो ये सम्पन्न अपने लिऐ ज़मीन कहाँ तलाशें । दु:ख़ से छुटकारा जब सुख़ ही है , तो सुखी से नफ़रत क्यों । अमीरों के भी अपने दु:ख़ और दर्द होते हैं , वे थोड़े अलग होते हैं बस । आम आदमी उन्हें कभी जान नहीं पाता ,क्या सिर्फ़ इसीलिऐ उन्हें धिक्कारा जाये । साम्यवाद हो कि , समाजवाद दोनों ही अपने देश के सर्वहारा को समर्थ और संपन्न बनाने का सपना बेचकर ही पल्लवित होते हैं । फिर पूर्व- संपन्नों से द्वेष क्यूँ ।कब तक हम बड़ा करते रहेंगे अपने बच्चों को वही कहानियाँ सुना-सुना कर , एक मेहनतकश , दयालु,ईमानदार किसान था और एक दुष्ट अत्याचारी राजा था । क्यों दया का , ईमानदारी का ठेका क्या सिर्फ़ ग़रीबों ने ही ले रखा है , कोई धनवान दयालु और सहृदयी नहीं हो सकता । शैतान का वज़ूद माने बिना , ईश्वर के होने का कोई औचित्य नहीं । मेरी ये रचना , स्थापित मान्यताओं से अलग, प्रति-संकेतों के साथ एक विरोधाभाषी शैली (कोंट्रा-लुक) में लिखी गई है ।
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