by Akanksha Gupta (Vedantika) ✓ · 22 Aug 2019
गुजारिश अनसुनी कर पँख पीछे छूट गये, जमीन पर उतरने वाले सपने आँखों में ही टूट गए। जाने कितने दिन तक मैं एक जिंदा लाश थी, आखिरी वक्त पर मुझे मेरे रक्षक से ही आस थी। विश्वासघात किया था उसने मेरी अंतिम श्वास पर, जिंदगी मिट गई मेरी उनकी भूख मिटाने पर।
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