
आधुनिकता की होड़ में समस्त हिंद-समाज, खोता जा रहा है। पाश्चात्य संस्कृति की आँधी मेंं जकड़ता हुआ समाज, लगातार खोखला होता जा रहा है। संस्कृति और सभ्यता केवल इतिहास के पन्नों को भरती नज़र आती है। क्यों कि युवा-शक्ति ही पथभ्रष्ट दिखाई दे रही है। अन्य सभ्यताओं, संस्कृतियों को अपनाने मेंं कोई बुराई नहीं, लेकिन इन्हें अपनाकर अपनी सभ्यताओं को गौण करना सही नहीं।
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