by Kavi Vijay Kumar Vidrohi ✓ · 20 Aug 2017
तैयार रहो लो ख़त्म हुआउस रणभेरी का गुंजन अतिवीर बढ़ो अब रणपथ परखुद करो कालअभिनंदन कर छिन्न भिन्न हर शत्रु उठा पुरजोर मुखर तलवारें आकाशदामिनी वार बनें निजनयन बनें अंगारे
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