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#vidrohi
6 poems
शूलों का विक्रेता
Kavi Vijay Kumar Vidrohi · 2 min read · 20.5K reads
संविधान में आग लगा दो यहाँ निर्भया रोती है लुप्त दामिनी लोकतंत्र के दूषित पगतल धोती है - राष्ट्रवादी कवि विजय कुमार विद्रोही
Inspirational
सहिष्णुता
Kavi Vijay Kumar Vidrohi · 1 min read · 20.8K reads
यही फलन है जब नवपीढ़ी आँसू से सन जाती है सहिष्णुता जब हद से बढ़ती कायरता बन जाती है -राष्ट्रवादी कवि विजय कुमार विद्रोही
Inspirational
“दिल को हिंदुस्तान करूँ”
Kavi Vijay Kumar Vidrohi · 2 min read · 255 reads
आज देख लो भारत अपनों ही से बाजी हार रहा जाने दो झूठी आशाऐं फिर वो कश्मीर उधार रहा,,,,,
Inspirational
कविमति
Kavi Vijay Kumar Vidrohi · 1 min read · 20.7K reads
तब तब मेरी कलमें आँसू को स्याही कर देती हैं...............
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काव्याग्नि
Kavi Vijay Kumar Vidrohi · 1 min read · 20.4K reads
तांडवजन्मा प्रलयअंश हूँ केवल रचनाकार नहीं , देशद्रोह के निजपुत्रों का कर सकता सत्कार नहीं .............. -विद्रोही
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श्री रामधारी सिंह दिनकर (श्रृद्धांजलि)
Kavi Vijay Kumar Vidrohi · 1 min read · 14.1K reads
बिहार चुनाव के कीड़ों की भूख इतनी बढ़ चुकी थी,जातिवाद की फसल इतनी विकसित हो चुकी कि, अब कवियों की जाति तक का पता लगाना इनका कार्य रह गया है । समाचार के अनुसार राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जाति जानने की अभिलाषा भी राजनीति का हिस्सा बना बैठे हैं । अब लगता है साहित्य जगत जो अभी तक आरक्षण से अछूता था ...वह भी । एक छोटी सी रचना निवेदन कर रहा हूँ । पूर्ण समर्थन का आशार्थी - विद्रोही
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