by Bharat Bhushan Pathak ✓ · 23 Jul 2019
सुबह की बेला थी होने को शाम में परिणत। प्रतीत हो रहा था मानो वो भी हो मेरे संताप में रत। कोलाहल से दूर मन अब भी तकता था राह। थी जिसमें पुष्पित- पल्लवित प्रेम अथाह ।
Loading comments…
Loading comments…