
पुरुष कितना कमजोर होता है। नारी के बिना वह जीवन की कल्पना भी नहीं कर पाता। बिस्तर पर पड़ी बीमार पत्नी भी उसका मनोबल बढ़ाती रहती है। मगर उसकी मौत उसे इस कदर तोड़ देती है कि उसके कमजोर शरीर में बची-खुची सांसे जैसे इस क्षण का इंतजार कर रही है। सुलेखा की मौत से दुःखी प्रो. त्रिवेदी ने सुलेखा का निर्जीव देह पर अपना सिर रखा और इस मानसिक आधात ने उन्हें भी सांसारिक दुःखों से निरक्त कर दिया।
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