by Sreenesh Ramesh Bindu Kini ✓ · 26 Aug 2017
यह कविता इंसान के आज की परिस्तिथि को दर्शाती है। इंसान आज बस दौड़ लगाए जा रहा है। पैसे कमाने की दौड़, जीतने की दौड़ आदि। स्वार्थ ही जैसे रोम-रोम में बस चुका है और खुदगर्ज़ी आज सबसे ऊपर है। क्या बताऊं तुझे ईश्वर, तेरा बनाया घोंसला है टूट रहा।
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