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#kavi
17 poems
शूलों का विक्रेता
Kavi Vijay Kumar Vidrohi · 2 min read · 20.5K reads
संविधान में आग लगा दो यहाँ निर्भया रोती है लुप्त दामिनी लोकतंत्र के दूषित पगतल धोती है - राष्ट्रवादी कवि विजय कुमार विद्रोही
Inspirational
बहरों की बस्ती
Kavi Vijay Kumar Vidrohi · 2 min read · 13.7K reads
संविधान का जर्जर तन मैं अंधों को दिखलाता हूँ । बहरों की बस्ती में पीड़ा लोकतंत्र की गाता हूँ । -राष्ट्रवादी कवि विजय कुमार विद्रोही
Inspirational
सहिष्णुता
Kavi Vijay Kumar Vidrohi · 1 min read · 20.8K reads
यही फलन है जब नवपीढ़ी आँसू से सन जाती है सहिष्णुता जब हद से बढ़ती कायरता बन जाती है -राष्ट्रवादी कवि विजय कुमार विद्रोही
Inspirational
कविमति
Kavi Vijay Kumar Vidrohi · 1 min read · 20.7K reads
तब तब मेरी कलमें आँसू को स्याही कर देती हैं...............
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पत्ते🌿🍀....
BʜᴀɪʏᴀJɪ . · 1 min read · 212 reads
तेरा हित चाहा मैंने हरदम, पर तू कभी माना ही नहीं।।
Abstract
काव्याग्नि
Kavi Vijay Kumar Vidrohi · 1 min read · 20.4K reads
तांडवजन्मा प्रलयअंश हूँ केवल रचनाकार नहीं , देशद्रोह के निजपुत्रों का कर सकता सत्कार नहीं .............. -विद्रोही
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