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#tribhwankaul
2 poems
व्यथा, अन्धकार की
Tribhawan Kaul · 1 min read · 13.4K reads
रात्रि का अन्धकार मूक, बधिर, उपेक्षित जीवन के आधारभूत मुल्यों को टटोलता इंसानो के अंतर्मन को समझने के कोशिश करता
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गुज़ारिश
Tribhawan Kaul · 1 min read · 1.3K reads
रात का नशीलापन, सुबह की ताज़गी मस्तियाँ दोपहर की, शाम की आवारगी. गजरे की भीनी सुगंध, खनखनाती चूड़ियाँ माथे का माँग-टीका, हुस्न की सादगी.
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