
तुमको नहीं लगता आज सर्दी बहुत ज्यादा है , ऐसा लग रहा मानो गरम हवाएं उदास सी हो गयी , चलो न एक एक चोकोबार खाते है और उन गरम हवाओं को बुलाते है जो की शायद नाराज़ है | अंसल मॉल के रेलिंग पे आज भी जब बैठता हूँ , ये बात बहुत कटोचती हैं ,कभी कभार खरोंचती भी है | मैं रूठ कर मॉल के अंदर किसी कोने में खरे सुनसान खम्भे में छुप जाता हूँ , शायद ये सोंच कर तुम्हारी यादें मुझको फिर न ढूंढ ले | पर नहीं , ये ढूंढ लेती ही हैं , सोंचता हूँ काश तुम्हारी यादें काले धन जैसी होती | काश !! काश !!!
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