- सर्द जुल्फें Dhairyakant Mishra · 2 min read · 21.7K readsतुम्हारी ज़ुल्फ का एक टुकड़ा मेरे कोट के एक बटन में कल लिपट कर मेरे पास आ गया था, मेरी नज़र जब उसकी सिसकियों पर पड़ी तो मैंने हल्के हाथों से उसको निकालने की एक नाकामयाब कोशिश की, लेकिन उसकी ज़िद के आगे मेरी नहीं चली। शायद बहुत सर्द सी थी, मैंने कई बार कहा है कि इस कदर अपनी ज़ुल्फ़ों को मत भिगोया करो, कुछ ज़ुल्फ़ें थोड़ी सेंसिटिव होती हैं हमारी तरह, और उनको कोल्ड की शिकायत हो जाती है अक्सर।Abstract
- यादों का एल्बम
Dhairyakant Mishra · 2 min read · 7.6K reads तो इसका मतलब क्या? तस्वीरों को मैं भी डिलीट कर दूँ? मैंने कई दफ़ा कोशिश की, पर ना तो दिल ने अप्रूव किया और ना ही उँगलियों ने। सोचता हूँ, कभी तस्वीरों को फ़ोन मेमोरी में ट्रांसफर करके एक बार रिस्टोर कर दूँ, मगर कम्बख़त मोबाइल ऍप्स ने फ़ोन मेमोरी का एक कोना भी नहीं छोड़ा है ।Abstract
- अधूरी पानीपुरी Dhairyakant Mishra · 1 min read · 7.5K reads"अरे! वो क्या है कि पापड़ी खाने की प्रथा इस देश मेँ बहुत पुरानी है, अगर तुमने गोलगप्पे खाने के बाद पापड़ी नहीं खाई तो लोग समझेँगे कि तुम गरीब पर एहसान कर रहे हो और कुछ अलग कर रहे हो, इससे जो लोग पापड़ी खाते हैं उनको हो जाती है दिक्कत, वो कहेँगे एहसान दिखाया नहीं जाता है, अगर भावनाएँ सच्ची हों तो उसको दिखाने की ज़रूरत नहीं होती। हो सकता है कि वो तुमको देशद्रोही भी घोषित कर दें अपने तथ्यों से। और अगर तुमने गोल टोपी लगाई है तो तुमको पाकिस्तान जाने की नसीहत भी मिल सकती है। एक्सट्रीम Abstract
- उदास गर्म हवाएं Dhairyakant Mishra · 2 min read · 21.9K readsतुमको नहीं लगता आज सर्दी बहुत ज्यादा है , ऐसा लग रहा मानो गरम हवाएं उदास सी हो गयी , चलो न एक एक चोकोबार खाते है और उन गरम हवाओं को बुलाते है जो की शायद नाराज़ है |
अंसल मॉल के रेलिंग पे आज भी जब बैठता हूँ , ये बात बहुत कटोचती हैं ,कभी कभार खरोंचती भी है | मैं रूठ कर मॉल के अंदर किसी कोने में खरे सुनसान खम्भे में छुप जाता हूँ , शायद ये सोंच कर तुम्हारी यादें मुझको फिर न ढूंढ ले | पर नहीं , ये ढूंढ लेती ही हैं , सोंचता हूँ काश तुम्हारी यादें काले धन जैसी होती | काश !! काश !!!Abstract
- सर्द रात Dhairyakant Mishra · 2 min read · 14.8K readsक्या बताऊँ , उस सर्द रात जब तुमने ये बताया की तुम सिर्फ मुझसे मिलने आ रही हो और वो भी रात के ९.३० बजे , मेरे ख्याल उस ख्याल की दहलीज़ लांघ चुके थे जो सिर्फ तुमको एक प्रशंशक के रूप में देखता था ,और ये सोंचते सोंचते मैंने अपने दाहिने जेब में पड़ी क्लासिक माइल्ड निकाल कर उसको बड़ी गर्म जोशी से फूंकने लगा |Abstract
- KasakDhairyakant Mishra · 2 min read · 21.3K readsआज पलकों की जिद भी अजीब थी ,आंशुओं को रास्ता देने से मना कर दिया फिर से ,उनको को रास्ता ही नहीं मिल रहा था अपने रास्ते के लिए और ज्यूंहि पलकोँ ने रास्ता पूरा बंद किया , नाराज होकर आंसू आँखोँ के अंदर जा छिपे ,कुछ पल इंतज़ार किया और फिर नसों के रास्ते होते हुए दिल के राइट चैँबर मेँ शिकायत लेके पहुँच गए |Abstract